"दौर आज का" कलियुग के इस कालचक्र में इंसाँ की क्या हस्ती है किश्तों में चलती साँसे हैं जीवन से मौत सस्ती है पेट की आग बुझाने को अब आदमी ही आदमी का निवाला है इस द्वन्द द्वेष की दुनिया में क्या मस्ज़िद है क्या शिवाला है बिख़री है टुकड़ों में मुस्कुराहट आँसुओं की क़ीमत सस्ती है शोषित समाज के भ्रष्ट चेहरे हैं और कहते हैं वतन परस्ती है आरोप प्रत्यारोप के इस दौर में अब बेशर्मी भरे बाज़ार हैं कहीं तो बेलग़ाम ज़ुबानें हैं कहीं प्रतिस्पर्धा करते अख़बार है कानून की साख़ पर अब तो धर्म और जाति की बस्ती है क्यूँ हम दुश्मन इंसानियत के अधूरे हम बिन मँझधार की कश्ती है
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