"दीद-ए-यार" उतरी ज़ुल्फ़ें यकायक यूँँ लहराती हुई जिस्म पर उस के जैसे रात ने अँधेरे का दरिया खोला हो साहिल पर कहाँ तक बचाता मैं नज़रें अपनी कि हर तरफ़ वो था अक्स था उस का कि हर साँस में ख़ुशबू थी उस की हर आवाज़ में हँसती वो रही वो दरख़्त जो छुए उस ने चलने लगे वो दरिया जो छुआ सागर से पिया न गया वो बैठा जिस डगर मंज़िल हो गई मुसाफ़िरों की वो जब सोया रात हो गई दिन दो-पहरी तितलियों ने रंग बदल दिए उस की हँसी पर फूल उस. की ख़ुशबू से महकने लगे मेरी सारी हक़ीक़तें बदल दी उस ने मेरे सारे अरमाँ अपने नाम कर दिए मैं रहा नहीं वो जिसे सुब्ह आईने में देख कर आया था अब मैं कोई और था और था किसी और का
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