(1) मौसम-ए-सर्मा की ठिठुराती हुई शाम-ए-हज़ीं चोटियों पर बर्फ़ की इक लाश सारे पेड़ नंगे टुड-मुंड सहन में वो चरमराते भूरे पत्तों का कफ़न एक सन्नाटा वो इक टहनी तड़ख़ कर गिर पड़ी इक साँस टूटा (२) मैं ने कल ही अपने बूढे बाप के ठंडे बदन को ग़ुस्ल दे के अपने हाथों काली धरती के दहाने में उतारा कि यही है रस्म मैं ज़िंदा भी पामाल-ए-रुसूम ज़िंदगी में वो चटकती रौशनी का एक मीनार-ए-बुलंद उस की किरनों ने हज़ारों क़ुमक़ु में रौशन किए और ये रस्म-ए-ज़माना उम्र-भर जो दूसरों को रौशनी देता रहा इक अँधेरी क़ब्र इस के वास्ते (३) आने वाले मौसमों में सैंकड़ों ही टहनियाँ फूटेंगी लेकिन जिस जगह उस पेड़ से ये शाख़ टूटी वो निशाँ इक दायरा बन कर रहेगा मैं ने जिन हाथों से अपने बाप के ठंडे बदन को काली धरती के दहाने में उतारा उस की पोरों से वो बूढ़ी धड़कनें क़िर्तास पर बहती रहेंगी
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