Kuch Alfaaz

"मान ले तैयार सब को" धूल उड़ती ही रही है आँख में चलते यहाँ से एक तू मुझ को बता दे आज चलना है कहाँ से याद रखना इक यही बस दिन सभी जलना यहाँ से ख़ुश नहीं हो साथ मेरे ज़िंदगी ढलना यहाँ से दूर मंज़िल आज भी है फ़र्ज़ अपना ताज भी है ठोकरों हिस्सा न कुछ भी कर्ज़ सपना नाज़ भी है दौड़ किस की ख़त्म होती शौक़ लालच प्यार सब को मिल रहे हैं यार धोके रोज़ अपने ख्वार सब को बोल दे जो हम बुरा फिर मान ले तैयार सब को

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