Kuch Alfaaz

चाहे जिस तौर बयाँ कीजिए अफ़साना-ए-दर्द जिस्म को ख़ौफ़ बहुत जान को अंदेशे थे चाहे जिस तौर रक़म कीजे गिराँ-जानी-ए-दिल ख़ूँ में हंगामा बहुत राह में वीराने थे लाख चाहा दिल-ए-मुज़्तर की कशाकश से सिवा रक़्स-ए-बे-परवा-ओ-बेबाक का आग़ाज़ करूँँ ख़ून-ए-दिल अश्क करूँँ अश्क गुहर-ताब करूँँ पस-ए-दीवार-ए-क़फ़स सीना-ए-दिल चाक करूँँ लाख चाहा दिल-ए-शोरीदा पे मश्कें थी बहुत लब-ए-मुश्ताक़ पे बूटों की ज़बाँ रक्खी थी जान घबराती थी अंदोह से तन में क्या क्या जान घबराती है अंदोह से तन में क्या क्या

Ekram Khawar
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