"दिन की रौशनी" घना अँधेरा है ये अँधेरा अभी जवाँ है तुम आओ तो अपनी मुट्ठी में जुगनू भर कर लाना लाना तुम अपने होंठो को मेरे लबों के क़रीब अपने देह की तपिश को मेरी बाँहों में आने देना आने देना क़तरा-क़तरा अपने रूह की तपिश तुम सेे ये ठंडी हवाएँ सिसकियाँ ले कर बहुत सवाल करेंगी मगर तुम्हें ख़याल करना होगा कि दिन की रौशनी हमें एक-दूसरे से जुदा करती है
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