दिन नहीं ढलता तो दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती फ़लक पर तारों की बिसात कैसे होती हम अपनी छत से महताब कैसे देखते नींद नहीं आती तो ख़्वाब कैसे देखते चाँद की चाँदनी का पता कैसे चलता किसी शाइ'र का घर बता कैसे चलता उजालों में उस सेे मिल पाते क्या ऐसे अब रात के ख़्यालों में मिलते हो जैसे अँधेरो का गर कहीं नाम नहीं होता चराग़ों का भी कोई काम नहीं होता दिन के बा'द अँधेरी रात होनी चाहिए ख़ुदस ख़ुद की मुलाक़ात होनी चाहिए रात नहीं होती तो अँधेरा नहीं होता अँधेरा नहीं होता तो सवेरा नहीं होता नए सवेरे से नई शुरुआत कैसे होती दिन नहीं ढलता तो ये रात कैसे होती
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