‘दिवाना’ तुम्हें कुछ पता भी है कोई तुम्हें देख कर जी रहा है ख़बर है किसी को इबादत सी लगने लगी हो है मालूम कुछ कौन है वो कि जिस की तुम्हीं पर नज़र है ये मानो तुम्हारा दिवाना है जिस की तुम्हारे ख़यालों में कटती हैं रातें तुम्हारी ही करता है हर वक़्त बातें वो लड़का मगर पहले ऐसा नहीं था किसी की अदाओं पे क़ातिल निगाहों पे ज़ुल्फ़ों की बादल सी दिलकश घटाओं पे मरता नहीं था किसी से मोहब्बत ही करता नहीं था पर अब जब से तुम आ गई हो अजब सा नशा इक हुआ है वो अब मुस्कुराने लगा है उसे ज़िंदगी भा गई है मोहब्बत भी रास आ गई है
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