Kuch Alfaaz

जल रहे हैं दिए मुंडेरों पर हो रहा है करम अँधेरों पर तुम जो बन कर किरन किरन आओ दाग़-ए-दिल भी हँसें सवेरों पर मुस्कुराती हुई चली आओ दिल सुलगता है दाग़ जलते हैं छनछनाती हुई चली आओ आरज़ूओं के बाग़ जलते हैं हुन की देवी हो तुम मिरे घर में रोज़ दीवाली ग़म-ज़दा घर में हुन लुटाती हुई चली आओ आँसुओं के चराग़ जलते हैं जिस को कहते हैं लोग दीवाली ऊँचे आदर्श की निशानी है बाप-दादों के पाक जीवन की एक अज़्मत-भरी कहानी है

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