कारवाँ बढ़ता रहा बढ़ता रहा पै-ब-पै जादा-ब-जादा अपनी मंज़िल की तरफ़ सफ़-ब-सफ़ शाना-ब-शाना रहरवों को ले चला जेहद-ए-पैहम का हर इक इक़दाम हासिल की तरफ़ फिर न जाने क्या हुआ कैसी चली उल्टी हवा दफ़्अ'तन क़दमों के नग़्में सर्द से होने लगे थक गया अज़्म-ए-सफ़र उम्मीद का दम घुट गया शौक़ के सरगर्म जज़्बे राह में खोने लगे कारवाँ वालो दिलाए तुम को कौन इस का यक़ीं जिस की ख़्वाहिश में बढ़े हो तुम वो मंज़िल है क़रीं
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