Kuch Alfaaz

किसी हँसती बोलती जीती-जागती चीज़ पर ये घमंड क्या ये गुमान क्यूँँ कहीं और आप की जान क्यूँँ ये तो सिलसिले हैं उसी फ़रेब-ए-ख़याल के ग़म ज़ात-ओ-ख़ैर-ओ-जमाल के वही फेर अहल-ए-सवाल के अजी ठीक है ये वफ़ा का ज़हर न घोलिए अरे आप झूट ही बोलिए नहीं सब के भेद न खोलिए कोई क्या करे न मिलें जो रंग ही रंग से डरो अपने जी की उमंग से कटे क्यूँँ निगाह पतंग से कभी बेकसी को पुकारते हैं शजर हजर मिरे पास कुछ भी नहीं मगर बड़ी ज़िंदगी है इधर-उधर ये सँभलते हाथों मैं काँपती है कमान क्यूँँ ये सरक रही है मचान क्यूँँ ये खिसक रहे हैं मकान क्यूँँ

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