Kuch Alfaaz

इक पत्ती के टूटने गिरने की आवाज़ से सिहर उठा है सहेमता पेड़ बे-तअल्लुक़ शाख़ पर बैठी है चिड़िया नाक के नीचे पड़ा है घोंसला बिखरा हुआ जिस के गिरने और बिखरने की सदास बे-ख़बर है पेड़ मुद्दतों से वो हमारी ही तरह हैं साथ साथ

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