दूर गगन के किसी छितिज पर चमक रहे कुछ तन्हा तारे शायद वो बेचैन भी होंगे अलग थलग जो हैं बेचारे फिर भी पल भर को अपनी वो चमक नहीं खोते हैं फिर हम क्यूँ हँसना भूल हैं जाते जब दुखी कभी होते हैं हर एक लहर जो उठती है वो सागर से बावस्ता है इन लहरों के आपस में भी कोई गहरा रिश्ता है मगर लहर सागर में कोई कहाँ ठहर पाती है हर एक लहर आ कर यूँँ तट पर टूट बिखर जाती है सैलाब मगर दरिया में फिर भी बंद नहीं होते हैं फिर हम क्यो हँसना भूल हैं जाते जब दुखी कभी होते है फिर हम क्यो हँसना भूल हैं जाते जब दुखी कभी होते हैं
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