Kuch Alfaaz

दुआ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ आस हम सब साथ उठाएँ हर मज़हब के दुतकारे लोग सब तरह से नाकारे लोग हम वो काफ़िर हैं जिन को मंदिर ने घुसने नहीं दिया हम वो काफ़िर हैं जिन को मस्जिद में पनाह नहीं मिली हम वो काफ़िर हैं जिनने ख़ुदा की नफ़ी में शे'र पढ़े कभी मज़ाक़ बनाया हम ने बंदों पर तंज़ अनेक कहे अब भी हम वो काफ़िर हैं ख़ुदा जिन का है ही नहीं पर अब जब कुछ तय ही नहीं कि कब तक लोग मरेंगे अब और वो जो रोज़ी के मारे हैं बच गए तो क्या करेंगे अब आओ, मेरे काफ़िर कि तुम्हें आज हरम ने याद किया है नमाज़ों का असर नहीं दिखता दीएं जल कर राख हुए आओ हाथ उठाते हैं दुआ करते हैं माना के ख़ुदा नहीं होता दुआ करें ,आवाज़ बनें बीमारों की साँस बनें वो साइंसदाँ जो हवा बना रहे वो ड्राइवर जो बीमार उठा रहे आओ घर बैठ कर दुआ करें दुआ कि दुनिया ठीक हो जाए कोई भी शख़्स मरे नहीं अब माना कि ये भी ज़्यादा है दुनिया की साँस अब आधा है जिस के घर ये डाइन गई हर शख़्स वहाँ बिलखता है घर के घर बीमार हुए आओ काफ़िरों फिर इक बार तुम इक इक आँसू ही दे दो इन इक इक आँसू से शायद दुआ कुबूल ही हो जाए रोने की रस्म निभाई जाए ये मरती धरती बचाई जाए हर तक हवा पहुँच पाए हर तक दुआ पहुँच पाए आओ ना इक साथ उठाएँ आओ काफ़िरों! हाथ उठाएँ

Vibhat kumar
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