दुहाई ख़ुदा करे कि शब-ए-वस्ल रास आए तुझे हमारी तरह गले से कोई लगाए तुझे तिरी निगाह से छुप कर तिरे ही कानों में जो बात हम ने कही थी वही सुनाए तुझे मज़ा तो जब है कि वो बे-ख़ुदी के आलम में हमारे शे'र पढ़े और गुदगुदाए तुझे हमारे तर्ज़-ए-तकल्लुम की चाशनी ले कर समाअतों को तिरी चू में और लुभाए तुझे इसी मिज़ाज से ले कर शुऊर-ए-इश्क़ कभी हमारे साँचे में ढल जाए और रिझाए तुझे तू रूठ जाए तो उस के दिल-ओ-जिगर काँपें रुँधी ज़बान से क़स में भरे मनाए तुझे तू उस की आँख में झाँके तो हम ही आएँ नज़र फिर ऐसे वक़्त में क्या कुछ न याद आए तुझे मगर जो ज़िक्र हमारा छिड़े तो चुप रहना जतन वो लाख करे पर पकड़ न पाए तुझे मिले कभी तो 'बशर' बे-समझ को समझाना जुनून-ए-इश्क़ भुला कर वो भूल जाए तुझे
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