Kuch Alfaaz

दूर मिरी जाँ तुझ सेे रहके बीते हैं दिन पूछो कैसे? इश्क़-मुहब्ब्त तो नामुम्किन बातें ही हों जैसे तैसे नज़्में-वज़्में हो जाती हैं शे'र लिखूँ तो बोलो कैसे? दिन में तारे छुपते फिरते चाँद चमकता जैसे तैसे

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