Kuch Alfaaz

फिर मुझे ऐसा लगा जैसे काग़ज़ पर सियाही फैलने से लफ़्ज़ गडमड हो गए हों आइना धुँदला गया हो जाने पहचाने हुए सब लोग जैसे अजनबी से बन गए हों मेरे कमरे में पड़ी टेबल के ख़ानों से निकल कर ख़त हवा में उड़ रहे हों बॉक्स में रखा हुआ रूमाल शो'ला बन गया हो बर्फ़ के तूदों तले दब कर ज़ेहन भी मुंजमिद होने के बदले जल रहा हो फिर मुझे ऐसा लगा जैसे मैं अपने से बाग़ी हो गया हूँ अपने ही ऊपर मैं हमला कर रहा हूँ सोचता हूँ मैं ने शायद कल तुझे कुछ कह दिया था तू ने भी मुझ को सुनाया था बहुत कुछ और फिर दोनों ही हम चुप हो गए थे

Aabid Adeeb
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