"एक आरज़ू" मैं तेरे ख़्वाब में आने की आरज़ू ले कर पड़ा रहता हूँ मैं बस अपने बिस्तर पर और सोचता हूँ क्या तुझ को भी मेरी आरज़ू है क्या तेरा दिल ख़ुद-शनास करता है क्या तू भी बे सबब रोने लगती है क्या तुझे भी मेरा ग़म उदास करता है नहीं-नहीं इन सब से तू जुदा ठहरी मैं ने बेकार तेरी चाह लगा रखी है फिर सोचता हूँ कहीं तू ने भी इस ज़माने के दर्द को न चाह कर अपने दिल से लगा रखा हो और तू भी अपने बिस्तर पर पड़े मेरी ही आरज़ू ले कर यही सोचती हो?
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