एक बजते हैं रात के एक बजते हैं ख़ुदा का नाम रटते हैं बीमार के साँस नहीं आ रही कोई भी आस नहीं आ रही फोन पर आवाज़ नहीं आ रही मौत पर आज नहीं आ रही इस अफरातफरी के आलम में इस ख़ामोशी से लिपटे ग़म में नींद नहीं है, रोते हैं रात के एक बजते हैं साय साय हवा की धुन सन्नाटा और अधेड़बुन न जाने क्या होता होगा शायद वो चैन से सोता होगा बस यही सच हो और सब हो झूठ ऐ मेरे रब! तू मत रूठ इस रात की सुब्ह भी आएगी सोने की वजह भी आएगी अभी बस बेचैन हैं, जगते हैं रात के एक बजते हैं
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