Kuch Alfaaz

बारिशें उस के बदन पर ज़ोर से गिरती रहीं और वो भीगी क़बा में देर तक चलती रही सुर्ख़ था उस का बदन और सुर्ख़ थी उस की क़बा सुर्ख़ थी उस दम हवा बारिशों में जंगलों के दरमियाँ चलते हो भीगते चेहरे को या उस की क़बा को देखते बाँस के गुंजान रस्तों पे कभी बढ़ते हुए उस की भीगी आँख में खुलती धनक तकते हुए और कभी पीपल के गहरे सुर्ख़ सायों के तले उस के भीगे होंट पे कुछ तितलियाँ रखते हुए बारिशों में भीगते लम्हे उसे भी याद हैं याद हैं उस को भी होंटों पे सजी कुछ तितलियाँ याद है मुझ को भी उस की आँख में खुलती धनक

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