Kuch Alfaaz

एक ही सिगरेट से कश लगाते रहे हम दोनों कभी ग़म के तो कभी ख़ुशी के तराने गुनगुनाते रहे हम दोनों तुम्हारे सुर्ख़ गुलाबी लबों पर सिगरेट ऐसे सजती है दिल में मानो हमारे जैसे बाँसुरी बजती है सिगरेट ना हो जैसे कोई गुलाब हो जो तुम ने चूमा है गर्मी के मौसम में भी आज बादल झूमा है तुम्हारे लबों से निकलता जो धुआँ है हमारे लबों को इसने बे-हिसाब छुआ है तुम्हारी साँसों की ख़ुशबू इस के साथ आई है ना जाने ये कैसी मदहोशी हम पर छाई है बस यूँँ हीं हमारी गोद में बैठी रहो तुम अब कभी हम कश लगाएं कभी तुम कश ये सिगरेट यूँँ हीं सुलगती रहे दिलों में आग यूँँ हीं जलती रहे तुम्हारे इन नर्म गुलाबी होंठो को छू कर सिगरेट बड़ा इतराती है हमारी ओर देख कर हम को बड़ा चिढ़ाती है मग़र सिगरेट की ज़िंदा-दिली देखिए तुम्हारे होंठों से निकलकर हमारे होंठो पे भी आ जाती है!!

Kumar Rishi
WhatsAppXTelegram
Create Image