"एक इबादत" अजीब सी रौशनी है उस की बातों में जब वो मुझ सेे पूछता है मसीहा तुम कहा हो तो लगता है जैसे सारा जहाँ कैंडल की रौशनी से जगमगाने लगा है कोई मीठी सी महक है उस की बातों में वक़्त-ए-नमाज़ उस को याद दिलाने पर जब वो कहता है मैं तुम्हारे इश्क़ की मस्ज़िद में नमाज़ पढ़ रहा हूँ' तो लगता है जैसे सारी दुनिया उस की दुआ के इत्र में महक रही हो एक इबादत है उस की ग़ज़लों में जब वो उतारता है मुझे अपनी ग़ज़लों में तो लगता है जैसे मंदिर में कोई श्रद्धा का दीप जल रहा हो
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