Kuch Alfaaz

"एक लड़की" बुलंद क़ामत की एक लड़की बिखेरती खुशबुएँ बदन की मेरी निगाहों की रहगुज़र से गुज़र गई है गरीब-मुफ़लिस किसी कुटी का है चाँद शायद है ख़ूब-सूरत, फ़टे-पुराने लिबास में भी बला की सुंदर ज़रा सा मेरे क़रीब आ कर हसीं लबों से यूँँ मुस्कुरा कर तमाम आलम को ख़ुशबुओं से वो भर गई है जबीं कुशादा चमक रही है कमर भी उस की है शाख जैसी लचक रही है लबों पे बिखरा हुआ तबस्सुम सियाह गेसू भी उस बदन से लिपट रहे हैं यूँँ जैसे कोई शजर से लिपटी हो बेल जैसे क़दम-क़दम पे ज्यूँ फूल खिलते हैं सुर्ख़ गोया, जिधर गई है वो जिस्मे-नाज़ुक तराश जिस की हो गोया हीरा वो बेश-क़ीमत हर इक अदा में ग़ज़ब की है शबनमी लताफ़त किसी परी-वश से ख़ूबसरत सुख़नवरों के ख़याल-सी है कि सुर्ख़-रू उस हसीन की मैं मिसाल क्या दूँ गुलाल-सी है निगाह ख़ंजर, अदाएँ क़ातिल कमाल लहजा, बस इक नज़र से मेरे जिगर में उतर गई है मैं हूँ एक शाइ'र सो मुझ को उस में ग़ज़ल दिखी है लगा है मुझ को कि जैसे बादे-सबा उसे गुनगुना रही है मगर वो लड़की जिसे गुमाँ तक नहीं है शायद ये हुस्न उस पर ही बोझ बन जाएगा यक़ीनन उसे कहो कि नक़ाब में रक्खे हुस्नो-इस्मत वगरना पछताएगी बा'द में वो वो मर्द कहते हैं जो यहाँ पर वो ख़ुद को साबित करेंगे बेशक दिखाएँगे उस गरीब पर ही वो ज़ोर अपनी मर्दानगी का करेंगे ज़ाहिर वो पाक-दामन को तार कर के कि मर्द हैं हम न उस में उन को दिखेगा बेबस बुज़ुर्ग आँखों का इक सितारा उन्हें फ़क़त वो फ़टे लिबासों से झाँकता इक बदन दिखेगा हवस-कदे में, पड़ी मिलेगी बस एक उरियाँ वो लाश बन कर न मर्द की शक्ल में उन दरिंदों को उस में कोई बहन दिखेगी न माँ दिखेगी, न कोई बेटी न उन को उस में ग़ज़ल दिखेगी न शा'इरी ही

KARAN
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