"एक लड़की" एक लड़की बड़ी हसीन जिगर थी जो मेरी मोहब्बतों का शजर आओ बैठो तुम्हें बताता हूँ क़िस्सा-ए-इश्क़ मैं सुनाता हूँ गोल चेहरा था रंग गोरा था क़द ज़रा उस का थोड़ा छोटा था ख़्वाब-ए-शीरीं में रोज़ आती थी आ के पहलू में बैठ जाती थी ख़ुश-नुमा मेरी रात करती थी मुझ सेे हँस हँस के बात करती थी फिर गुलिस्ताँ में साथ जाती थी नग़्मा-ए-शौक़ गुनगुनाती थी गुल गुलिस्ताँ के उस पे मरते थे भँवरे उस का तवाफ़ करते थे शाख़-ए-गुल से वो गुल को चुनती थी फिर मोहब्बत की डोर बुनती थी दिल जिगर और मन में रहती थी ख़ून बनकर रगों में बहती थी मुझ को अपना हबीब कहती थी हर घड़ी मुझ में खोई रहती थी जब भी हम साथ साथ चलते थे दिल रक़ीबों के उस के जलते थे सब को मंज़र बहुत ये खलता था हर कोई देख हाथ मलता थे चाँद से बे जा ख़ूब-सूरत थी सादगी की हसीन मूरत थी मेरे आँखों में ख़्वाब रखती थी रूख़ पे अपने नक़ाब रखती थी ऐसी लगती थी अपने यारों में जैसे कोई गुलाब ख़ारों में ज़िक्र पे मेरे मुस्कुराती थी नाम लेने में हिचकिचाती थी उस का इतना हसीं ज़माना था हर बशर उस का ही दीवाना था लाल रंग को पसंद करती थी बाक़ी हर रंग से वो डरती थी ख़ूब-सूरत से ख़्वाब जैसा था उस का रुख़ माहताब जैसा था शौक़ उस के सभी नवाबी थे होंठ नाज़ुक थे और गुलाबी थे मुझ में गुम थी वो उस में मैं गुम था उस के होंठों का मैं तबस्सुम था एक दूजे का सुनिए मान थे हम जिस्म दो थे पर एक जान थे हम दिन में आँखें ख़ुमार देतीं थी रात में जुगनू सी चमकती थी चाँद के जैसा उस का चेहरा था ज़ुल्फ़-ए-पुर-ख़म का उस पे पहरा था वो जो गुलशन में गुल है नाज़ुक सा हू-बा-हू उस का ऐसा था लहजा उस की ज़ुल्फें बताऊँ कैसी थी यार रेशम के डोरे जैसी थी पास होकर वो जब गुज़रती थी रात की रानी सी महकती थी चार हरफों का नाम होता था इब्तेदा हर्फ़-ए-लाम होता था उजड़े मौसम की एक बहार थी वो ज़िंदगानी का पहला प्यार थी वो कॉफी लस्सी से बे जा नफ़रत थी उस को बस चाय से मोहब्बत थी कप को होंठों से जब लगाती थी बा ख़ुदा जान मेरी जाती थी हादसे का सताता था सदा डर चाय से जल ना जाएँ होंठ उधर मुझ को ये इश्क़ रास आ ना सका उस को सीने से मैं लगा ना सका ख़ानदानी रिवाज लाई थी उस की रग रग में बे वफ़ाई थी बे वफ़ाई की जैसे बात चली पास आ कर वो मुझ सेे कहने लगी उस का दिल सुन मेरा ठिकाना था मेरा दिल उस का आशियाना था ख़्वाब दोनों का एक पुराना था चाँद के पार साथ जाना था क़ल्ब-ए-मुज़्तर का इत्मीनान थी वो दिल की धड़कन थी मेरी जान थी वो मुझ पे एहसान ये शजर कर दो क़िस्सा-ए-इश्क़ मुख़्तसर कर दो
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