Kuch Alfaaz

हबीब-ए-जाँ तुम अगर वबा के दिनों में आए तो ब-सद अक़ीदत-ओ-मोहब्बत तुम्हारे हाथ चूमूँगी क्यूँँकि ये मेरे मसीहा के हाथ हैं तुम्हारी चादर को अपने हाथों से तह कर के अपने सिरहाने रखूँगी कि इस बकल की हरारत मुझ पर कश्फ़ के दर खोलती है तुम्हारे जूतों को क़रीने से जोड़ कर पलंग के पास रखूँगी तुम्हारे साथ एक प्लेट में खाना खाऊँगी और तुम्हारी ज़िद्दी नज़रों का भरम रखूँगी न-जाने मुझे क्यूँ लगता है कि वबा की आँख में मोहब्बत करने वालों के लिए कुछ हया बाक़ी होगी

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