"एक नदिया की मँझधार में" जैसे गहरी सी नदिया की मँझधार में ऐसे उलझा पड़ा हूँ मैं संसार में जो भी चाहे वो उतनी ही चाबी भरे जैसे कोई खिलौना हूँ बाज़ार में सब ने हम को यूँँ देखा अनदेखा किया ये तो होता नहीं है घर परिवार में बातें दिल में यूँँ कुछ मेरे चुभती रही लगती है कील इक जैसे दीवार में कोई सोचे भला कोई सोचे बुरा अंतर आने लगा सबके किरदार में जैसे गहरी सी नदिया की मँझधार में ऐसे उलझा पड़ा हूँ मैं संसार में
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