"एक नज़्म" मैं एक नज़्म लिखना चाहता हूँ किसी के वादों पे, किसी के इरादों पे किसी की आँखों पे, किसी के बातों पे काँपते हाथों पे, अँधी आँखों पे माँ की लोरी पे, गाँव की छोरी पे कानून की पट्टी पे, देश की मिट्टी पे पहला प्यार पे, रोज़ बदलते यार पे बेवफ़ाओं के सूरत पे, कलियों के मूरत पे जिगरी यार पे, दुश्मनों के वार पे हाथों के लकीर पे, हाथ फैलाते फ़क़ीर पे टूटे दिल पे, होटल के बिल पे शाइरों के प्यार पे, कोई काम बेकार पे एक नज़्म लिखना चाहता हूँ
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