Kuch Alfaaz

"एक रूखा-सूखा दिन" कैसा था दोस्त आज तेरा दिन आज अच्छा नहीं गया ये दिन यूँँ ही था रूखा-सूखा मेरा दिन ये सवेरे से कुछ कमी सी थी सुब्ह की रौशनी भी धुँधली थी चाय की चुस्की ज़्यादा फीकी थी पास मेरे गिटार रूठा था मौसम-ए-दिल का हाल कैसा था शांत था ये कभी-कभी वरना इस में चिल्ला रहा था कुछ तूफ़ाँ जिस ने बेहोश कर दिया मुझ को जब उठा मैं ने देखा ये बाहर सूखा था गोला रौशनी मद्धम चांदनी में दिखा अकेलापन और क्यूँँ ऐसा गुज़रा तेरा दिन बात कोई नहीं हुई उस सेे उस सेे हाँ प्यार है मुझे जिस सेे

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