Kuch Alfaaz

अब हद से गुज़र जाने का इमकान बहुत है लुटने को अभी इश्क़ में सामान बहुत है आँखों को सहूलत है उसे देख रही हैं इतनी भी सहूलत तो मेरी जान बहुत है

Khalid Azad
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