Kuch Alfaaz

अब कोई कान्हा कहाँ जो जान ले इस पीर को इक दुशासन खींचता है ज़िंदगी के चीर को ज़िन्दगी की रेलगाड़ी आ गई आगे बहुत मैं उतरने जा रहा हूँ खींच कर ज़ंजीर को

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