Kuch Alfaaz

अब मुझे आराम करना है मिले मंज़िल मिरी भी अब थकन होने लगी सच में सफ़र की इस थकन से बाग़बाँ होते हुए तेरे यहाँ कैसा सितम है रोज़ कोई तोड़ लेता है गुलो-नर्गिस चमन से

WhatsAppXTelegram
Create Image