ghazalKuch Alfaaz

इस पार मैं हूँ झील के उस पार आप हैं लहरों के आइनों में लगातार आप हैं ऐ काश वो ये पूछें तुम्हें क्या पसंद है बे-साख़्ता मैं कह पड़ूँ सरकार आप हैं उस की ख़मोशियों की बलागत न पूछिए जिस के लब-ए-ख़मोश का इज़हार आप हैं अब एहतिराम करने लगे मेरा सारे ग़म किस ने बता दिया मेरे ग़म-ख़्वार आप हैं कलियों के लब पे सजती है मुस्कान आप की हर मौसम-ए-बहार का सिंगार आप हैं

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