नज़र-अंदाज़ करने की सज़ा देनी थी तुझ को तेरे दिल में उतर जाना ज़रूरी हो गया था

Writer
Waseem Barelvi
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Sher
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Ghazal
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Nazm
सब के चेहरे पे जो तनक़ीद किया करते हैं आइना उन को दिखा दो तो मज़ा आ जाए
मोहब्बत के घरों के कच्चे-पन को ये कहाँ समझें इन आँखों को तो बस आता है बरसातें बड़ी करना
जैसा दिखाई देने की करते हो कोशिशें मैं ख़ूब जानता हूँ कि ऐसे नहीं हो तुम
तुम्हारा प्यार तो साँसों में साँस लेता है जो होता नश्शा तो इक दिन उतर नहीं जाता
जाके लौटा है कहीं कोई हवा का झोंका तुम ने क्या सोच के दरवाज़ा खुला रक्खा है
ध्यान रहे ये लोग तुम्हारी सफ़ में डर कर आए हैं तुम को ज़िंदा क्या रक्खेंगे जो ख़ुद मर कर आए हैं
कुछ तो कर आदाब-ए-महफ़िल का लिहाज़ यार ये पहलू बदलना छोड़ दे
ज़रा सा क़तरा कहीं आज अगर उभरता है समुंदरों ही के लहजे में बात करता है
क्या बताऊँ कैसा ख़ुद को दर-ब-दर मैं ने किया उम्र भर किस किस के हिस्से का सफ़र मैं ने किया
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