गुज़िश्ता साल के ज़ख़्मो हरे-भरे रहना जुलूस अब के बरस भी यहीं से निकलेगा

Writer
Rahat Indori
@rahat-indori
31
Sher
41
Ghazal
0
Nazm
ऐ वतन इक रोज़ तेरी ख़ाक में खो जाएँगे सो जाएँगे मर के भी रिश्ता नहीं छूटेगा हिंदुस्तान से ईमान से
मैं अहमियत भी समझता हूँ क़हक़हों की मगर मज़ा कुछ अपना अलग है उदास होने का
वो चाहता था कि कासा ख़रीद ले मेरा मैं उस के ताज की क़ीमत लगा के लौट आया
मैं वो दरिया हूँ कि हर बूँद भँवर है जिस की तुम ने अच्छा ही किया मुझ से किनारा कर के
अब तो हर हाथ का पत्थर हमें पहचानता है उम्र गुज़री है तेरे शहर में आते जाते
साथ चलना है तो तलवार उठा मेरी तरह मुझ सेे बुज़दिल की हिमायत नहीं होने वाली
माँ के क़दमों के निशाँ हैं कि दिए रौशन हैं ग़ौर से देख यहीं पर कहीं जन्नत होगी
ख़याल था कि ये पथराव रोक दें चल कर जो होश आया तो देखा लहू लहू हम थे
उस की याद आई है साँसों ज़रा आहिस्ता चलो धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है
Similar Writers
Our suggestions based on Rahat Indori.







