ghazalKuch Alfaaz

मैं बुरा हूँ और हूँ मजबूऱ आदत के लिए दूर रहिए आप भी अपनी शराफत के लिए है अगर मुझ सेे गिला तो आज़मा के देख ले तू कहे तो जान हाज़िर है मुहब्बत के लिए तेरे आगे ख़ूब-सूरत चाँद भी फीका पड़े और क्या तारीफ़ तेरी यार सूरत के लिए आदतों से यार गर तासीर मिलती है यहाँ ख़ुद को भी बर्बाद कर लूँ मैं भी आदत के लिए मर के ही तो आदमी बनता बड़ा है आज , सो हम भी देखो मर रहे हैं थोड़ी इज़्ज़त के लिए बे-वफ़ा हैं, आप फिर भी दिल लगाया आपसे मिल रही है इस लिए भी दाद हिम्मत के लिए घर में कुछ भी बोल कर चल जाएगा तो काम पर भीड़ में क्या बोलना है सीख गैरत के लिए ये शिकायत मुझ को है क्यूँँ दोहरापन है यहाँ इस जहाँ में क़ायदे क्यूँँ सिर्फ़ औरत के लिए

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