ghazalKuch Alfaaz

ये हिजरतों का ज़माना भी क्या ज़माना है उन्हीं से दूर हैं जिन के लिए कमाना है ख़ुशी ये है कि मिरे घर से फ़ोन आया है सितम ये है कि मुझे ख़ैरियत बताना है हमें ये बात बहुत देर में समझ आई वहीं तो जाल बिछा है जहाँ भी दाना है हमें जला नहीं सकती है धूप हिजरत की हमारे सर पे ज़रूरत का शामियाना है नमाज़ ईद की पढ़ कर मैं ढूँढ़ता ही रहा कहीं दिखे कोई अपना गले लगाना है वहीं वहीं लिए फिरती है गर्दिश-ए-दौराँ जहाँ जहाँ भी लिखा मेरा आब-ओ-दाना है

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