ghazalKuch Alfaaz
ये सोच कर मेरा सहरा में जी नहीं लगता मैं शामिले सफे आवारगी नहीं लगता कभी-कभी वो ख़ुदा बन के साथ चलता है कभी-कभी तो वो इंसान भी नहीं लगता यक़ीन क्यूँ नहीं आता तुझे मेरे दिल पर ये फल कहाँ से तुझे मौसमी नहीं लगता मैं चाहता हूँ वो मेरी जबीं पे बौसा दे मगर जली हुई रोटी को घी नहीं लगता तेरे ख़याल से आगे भी एक दुनिया है तेरा ख़याल मुझे सरसरी नहीं लगता मैं उस के पास किसी काम से नहीं आता उसे ये काम कोई काम ही नहीं लगता
Tehzeeb Hafi66 Likes







