nazmKuch Alfaaz

तुझ को कितनों का लहू चाहिए ऐ अर्ज़-ए-वतन जो तिरे आरिज़-ए-बे-रंग को गुलनार करें कितनी आहों से कलेजा तिरा ठंडा होगा कितने आँसू तिरे सहराओं को गुलज़ार करें तेरे ऐवानों में पुर्ज़े हुए पैमाँ कितने कितने वादे जो न आसूदा-ए-इक़रार हुए कितनी आँखों को नज़र खा गई बद-ख़्वाहों की ख़्वाब कितने तिरी शह-राहों में संगसार हुए ''बला-कशान-ए-मोहब्बत पे जो हुआ सो हुआ जो मुझ पे गुज़री मत उस से कहो, हुआ सो हुआ मबादा हो कोई ज़ालिम तिरा गरेबाँ-गीर लहू के दाग़ तू दामन से धो, हुआ सो हुआ'' हम तो मजबूर-ए-वफ़ा हैं मगर ऐ जान-ए-जहाँ अपने उश्शाक़ से ऐसे भी कोई करता है तेरी महफ़िल को ख़ुदा रक्खे अबद तक क़ाएम हम तो मेहमाँ हैं घड़ी भर के हमारा क्या है

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Faiz Ahmad Faiz's nazm.

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Faiz Ahmad Faiz.