nazmKuch Alfaaz

मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी जब पास तू नहीं होती ख़ुद को कितना उदास पाता हूँ गुम से अपने हवा से पाता हूँ जाने क्या धुन समाई रहती है इक ख़मोशी सी छाई रहती है दिल से भी गुफ़्तुगू नहीं होती मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी रह रह के मेरे कानों में गूँजती है तिरी हसीं आवाज़ जैसे नादीदा कोई बजता साज़ हर सदा नागवार होती है इन सुकूत-आश्ना तरानों में मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी शब की तवील ख़ल्वत में तेरे औक़ात सोचता हूँ मैं तेरी हर बात सोचता हूँ मैं कौन से फूल तुझ को भाते हैं रंग क्या क्या पसंद आते हैं खो सा जाता हूँ तेरी जन्नत में मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी एहसास से नजात नहीं सोचता हूँ तो रंज होता है दिल को जैसे कोई डुबोता है जिस को इतना सराहता हूँ मैं जिस को इस दर्जा चाहता हूँ मैं इस में तेरी सी कोई बात नहीं मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी शब की तवील ख़ल्वत में तेरे औक़ात सोचता हूँ मैं तेरी हर बात सोचता हूँ मैं कौन से फूल तुझ को भाते हैं रंग क्या क्या पसंद आते हैं खो सा जाता हूँ तेरी जन्नत में मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन फिर भी एहसास से नजात नहीं सोचता हूँ तो रंज होता है दिल को जैसे कोई डुबोता है जिस को इतना सराहता हूँ मैं जिस को इस दर्जा चाहता हूँ मैं उस में तेरी सी कोई बात नहीं मैं तुझे चाहता नहीं लेकिन

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