nazmKuch Alfaaz

"ज़ंजीर" हम को हमारी ज़ात ने रुसवा किया बहुत हम चाह कर भी ज़ात से आगे न जा सके उस ने हमें यूँँ बाँध रखा था कि हम कभी उस की हद-ए-निग़ाह से आगे न जा सके हम रोज़ कह रहे थे के आज़ादी चाहिए पर सच यही था उस सेे फ़क़त कह रहे थे हम हर रोज़ उस के ज़ुल्म-ओ-सितम बढ़ रहे थे दोस्त हर रोज़ उस के ज़ुल्म-ओ-सितम सह रहे थे हम जो कह रहे थे ये कि हमें इश्क़ हो गया वो ख़ुद ही ज़ुल्म कर रहे थे आशिकों के साथ सब सेे अजीब बात थी उस क़त्ल-गाह की मोमिन भी मर रहे थे वहाँ क़ाफ़िरों के साथ सब चीख़ते थे हमकों बचाओ बचाओ पर कोई किसी की जान बचाए तो किस तरह जब रक़्स कर रही हो क़ज़ा ज़िन्दगी के साथ ऐसे में कोई साथ निभाये तो किस तरह जो चीख़ते थे उन की ज़बाँ काट दी गई जो बे-ज़बान थे वो ख़मोशी से मर गए धोखे हुए कुछ ऐसे भी बीनाई के हमें आँखों से फिर तो ख़्वाब भी देखे न जा सके इक दिन हुआ यूँँ हमनें वो ज़ंजीर तोड़ दी पर ख़ौफ़ हो रहा था फ़क़त एक बात से ऐसा न हो कि इक के लिए सब को मार दें सो लौट आए सबकी हिफ़ाज़त के वास्ते हम चाहते तो भाग भी जाते वहाँ से दोस्त पर सच कहें तो हम सेे यूँँ भागा न जा सका फिर भागते भी कैसे बहुत लोग थे वहाँ सब को अकेले छोड़ के जाया न जा सका फिर यूँँ हुआ कि लौट के हम आ गए वहीं वो ही जगह जहाँ पे मुहब्बत भी क़ैद थी कहने लगे कि फिर से ये ज़ंजीर बाँध दो कैसे न जाने मेरी ये ज़ंजीर खुल गई

Similar Moods

View All ›

More moods that pair well with Ansh Ghafil's nazm.

Similar Writers

View All ›

Our suggestions based on Ansh Ghafil.