ghazalKuch Alfaaz

मेहरबाँ हो के बुला लो मुझे चाहो जिस वक़्त मैं गया वक़्त नहीं हूँ कि फिर आ भी न सकूँ ज़ोफ़ में ताना-ए-अग़्यार का शिकवा क्या है बात कुछ सर तो नहीं है कि उठा भी न सकूँ ज़हर मिलता ही नहीं मुझ को सितमगर वर्ना क्या क़सम है तिरे मिलने की कि खा भी न सकूँ इस क़दर ज़ब्त कहाँ है कभी आ भी न सकूँ सितम इतना तो न कीजे कि उठा भी न सकूँ लग गई आग अगर घर को तो अंदेशा क्या शो'ला-ए-दिल तो नहीं है कि बुझा भी न सकूँ तुम न आओगे तो मरने की हैं सौ तदबीरें मौत कुछ तुम तो नहीं हो कि बुला भी न सकूँ हँस के बुलवाइए मिट जाएगा सब दिल का गिला क्या तसव्वुर है तुम्हारा कि मिटा भी न सकूँ

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