ghazalKuch Alfaaz

नहीं है मुन्हसिर इस बात पर यारी हमारी के तू करता रहे नाहक़ तरफदारी हमारी अंधेरे में हमें रखना तो ख़ामोशी से रखना कही बेदार ना हो जाए बेदारी हमारी मगर अच्छा तो ये होता हम एक साथ रहते भरी रहती तेरे कपड़ो से अल्मारी हमारी हम आसानी से खुल जाए मगर एक मसला है तुम्हारी सतह से ऊपर है तहदारी हमारी कहानीकार ने किरदार ही ऐसा दिया है अदाकारी नहीं लगती अदाकारी हमारी हमें जीते चले जाने पर माइल करने वाली यहा कोई नहीं लेकिन सुखनकारी हमारी

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