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थोड़े-मोड़े थोड़ी हम तो बेहद अजीब थे रस्ते तब बदले जब हम मंज़िल के क़रीब थे किस पर मढ़ते दोष अपनी बर्बादी का 'आतिश' दूजा कोई न था हम ख़ुद ही अपने रक़ीब थे
Aatish Indori1 Likes
थोड़े-मोड़े थोड़ी हम तो बेहद अजीब थे रस्ते तब बदले जब हम मंज़िल के क़रीब थे किस पर मढ़ते दोष अपनी बर्बादी का 'आतिश' दूजा कोई न था हम ख़ुद ही अपने रक़ीब थे
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