खोने नहीं दूँगा किसी भी शर्त पे इनको बस दोस्त ही हैं मर्द के ज़ेवर उसे कहना

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Ankit Maurya
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हर घड़ी कर रही नज़दीक बिछड़ने के मुझे घड़ी मुझ सेे तेरा चलना नहीं देखा जाता
वो बस रस्मन लेे लेता है राय मेरी करनी उस को हरदम अपनी होती है
वो ग़ुस्से में सीधी बात नहीं करता तूफ़ानों में बारिश तिरछी होती है
मुझ को गया था छोड़ के वो कितने तैश में लेकिन ख़ुशी से रह न सका एक साल भी
इन के सहारे कुछ नए से धुन बनाऊँगा लाया हूँ उस के पाँव से घुँघरू निकाल कर
हम ऐसे लोग ग़लती से कभी जो ख़्वाब देखें तो ग़रीबी ख़्वाब के मुँह पे तमाचा मार देती है
है समझना आप को तो शे'र से इज़हार समझें बात कहने को भला हम फूल क्यूँ तोड़ा करेंगे
जीत भी लूँ गर लड़ाई तुम से मैं तो क्या मिलेगा हाथ में दोनों के बस इक टूटा सा रिश्ता मिलेगा
दुनिया में अा के फँस गया हूँ इस तरह से मैं मछली फंसी हुई हो कोई जैसे जाल में
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