ख़ौफ़ खाता है क्यों ज़माने का तुझे तो फ़न है आज़माने का
Writer
Anshika Shukla
@anshika15072002
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Ghazal
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Nazm
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sherKuch Alfaaz
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चाँद जुगनू से लड़ रहा है क्यूँ चाँद में ख़ुद की रौशनी है क्या
sherKuch Alfaaz
ज़िंदगी हमक़दम रही लेकिन वक़्त से हमक़दम नहीं होती
sherKuch Alfaaz
वो जिस हमदर्द को आँसू मिरे अश'आर लगते थे उसी बे-दर्द को मेरी हँसी अच्छी नहीं लगती
sherKuch Alfaaz
इश्क़ वहशत कैफ़ियत और कुछ किताबें बस इन्हीं से ज़िंदगानी चल रही है
sherKuch Alfaaz
आप के सिम्त से जाने की तमन्ना तो नहीं फ़िक्र मत करिए चले जाएँगे रफ़्ता रफ़्ता
sherKuch Alfaaz
ये कहने की इजाज़त चाहिए थी हमें थोड़ी रियायत चाहिए थी
sherKuch Alfaaz
टूटा सूखा पत्ता पतझर में कहने लगता है मुझ सेे अब जब हम बर्बाद हुए हैं तब जा कर के महकी हो तुम
sherKuch Alfaaz
तेरा मेआ'र तो अपनी जगह है मगर बीमार तो अपनी जगह है
sherKuch Alfaaz
परिंदे भी मुड़कर नहीं आएँगे क्या दरख़्तों के दिन अब गुज़र जा रहे हैं
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