ख़ुदा की उस के गले में अजीब क़ुदरत है वो बोलता है तो इक रौशनी सी होती है
Writer
Bashir Badr
@bashir-badr
26
Sher
25
Ghazal
0
Nazm
सात संदूक़ों में भर कर दफ़्न कर दो नफ़रतें आज इंसाँ को मोहब्बत की ज़रूरत है बहुत
पत्थर के जिगर वालो ग़म में वो रवानी है ख़ुद राह बना लेगा बहता हुआ पानी है
ये शबनमी लहजा है आहिस्ता ग़ज़ल पढ़ना तितली की कहानी है फूलों की ज़बानी है
चराग़ों को आँखों में महफ़ूज़ रखना बड़ी दूर तक रात ही रात होगी
इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
तुझे भूल जाने की कोशिशें कभी कामयाब न हो सकीं तिरी याद शाख़-ए-गुलाब है जो हवा चली तो लचक गई
दिल की बस्ती पुरानी दिल्ली है जो भी गुज़रा है उस ने लूटा है
मैं ख़ुदा का नाम ले कर पी रहा हूँ दोस्तो ज़हर भी इस में अगर होगा दवा हो जाएगा
सुना है बद्र साहब महफ़िलों की जान होते थे बहुत दिन से वो पत्थर हैं न हँसते हैं न रोते हैं
Similar Writers
Our suggestions based on Bashir Badr.







