तमाम उम्र अकेले में तुझ से बातें कीं तमाम उम्र तेरे रू-ब-रू ख़मोश रहे
Writer
Khursheed Rizvi
@khursheed-rizvi
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Sher
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Ghazal
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Nazm
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sherKuch Alfaaz
sherKuch Alfaaz
कभी अपनी आँख से ज़िंदगी पे नज़र न की वही ज़ाविए कि जो आम थे मुझे खा गए
sherKuch Alfaaz
कब निकलता है कोई दिल में उतर जाने के बा'द इस गली की दूसरी जानिब कोई रस्ता नहीं
sherKuch Alfaaz
जिन लोगों में रहता हूँ मैं उन में से नहीं हूँ हूँ कौन मुझे अपना ज़माना नहीं मिलता
sherKuch Alfaaz
जब कभी ख़ुद को ये समझाऊँ कि तू मेरा नहीं मुझ में कोई चीख़ उठता है नहीं ऐसा नहीं
sherKuch Alfaaz
आसाँ तो नहीं अपनी हस्ती से गुज़र जाना उतरा जो समुंदर में दरिया तो बहुत रोया
sherKuch Alfaaz
तू मुझे बनते बिगड़ते हुए अब ग़ौर से देख वक़्त कल चाक पे रहने दे न रहने दे मुझे
sherKuch Alfaaz
आख़िर को हँस पड़ेंगे किसी एक बात पर रोना तमाम उम्र का बे-कार जाएगा
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