दिया जला के सभी बाम-ओ-दर में रखते हैं और एक हम हैं इसे रह-गुज़र में रखते हैं

Writer
Abrar Kashif
@abrar-kashif
14
Sher
2
Ghazal
2
Nazm
घर की तक़्सीम में अँगनाई गँवा बैठे हैं फूल गुलशन से शनासाई गँवा बैठे हैं
करती है तो करने दे हवाओं को शरारत मौसम का तकाज़ा है कि बालों को खुला छोड़
हर एक लफ़्ज़ के तेवर ही और होते हैं तेरे नगर के सुख़न-वर ही और होते हैं
अब के हम तर्क-ए-रसूमात कर के देखते हैं बीच वालों के बिना बात कर के देखते हैं
अब तो लगता है कि आ जाएगी बारी मेरी किस ने दे दी तेरी आँखों को सुपारी मेरी
सितारे और क़िस्मत देख कर घर से निकलते हैं जो बुज़दिल हैं मुहूरत देख कर घर से निकलते हैं
मैं अपने दोनों तरफ़ एक सा हूँ तेरे लिए किसी से शर्त लगा फिर मुझे उछाल के देख
दर्द-ए-मुहब्बत दर्द-ए-जुदाई दोनों को इक साथ मिला तू भी तन्हा मैं भी तन्हा आ इस बात पे हाथ मिला
दिन में मिल लेते कहीं रात ज़रूरी थी क्या? बेनतीजा ये मुलाक़ात ज़रूरी थी क्या
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